Banner शक्कर और वनस्पति तेल

शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय

हमारे बारे में

शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग का एक संबद्ध कार्यालय है और चीनी तथा गन्‍ना क्षेत्र, गन्‍ना उत्‍पादकों को चीनी फैक्‍ट्रियों द्वारा गन्‍ना देयों के उचित और लाभकारी मूल्‍य (एफ आर पी) को निर्धारित करने, चीनी उद्योग के विकास और विनियमन (चीनी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रशिक्षण सहित) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के अंतर्गत चीनी की आपूर्ति से संबंधित नीतिगत विषयों सहित चीनी के उत्‍पादन, वितरण और खपत से संबंधित नीतियों के कार्यान्‍वयन हेतु उत्‍तरदायी है। यह निदेशालय खाद्य तेल क्षेत्र के प्रबंधन विशेषकर उपलब्‍धता और कीमतों की निगरानी में भी विभाग की सहायता करता है।


अ) शर्करा प्रभाग

30.09.2018 को देश में लगभग 342 लाख मीट्रिक टन चीनी उत्‍पादन की पर्याप्‍त पेराई की क्षमता के साथ 740 चीनी मिलें स्‍थापित हैं। इस क्षमता को सरसरी तौर पर निजी क्षेत्र की तथा सहकारिता क्षेत्र की यूनिटों में बराबर विभाजित किया गया। कुल मिलाकर, चीनी मिलों की क्षमता 2500 टीसीडी से 5000 टीसीडी ब्रेकेट है लेकिन इसमें तेजी से वृद्धि हो रही है तथा यह क्षमता 10000 टीसीडी को पार कर रही है। दो आधुनिक रिफाइनरियां भी देश में गुजरात तथा पश्‍चिम बंगाल के तटवर्ती क्षेत्रों में स्‍थापित की गई हैं जो मुख्‍यतया आयातित कच्‍ची चीनी से रिफाइंड चीनी तथा उत्पादित घरेलू कच्‍ची चीनी से रिफाइंड चीनी का उत्‍पादन करती हैं। देश में चीनी मिलों का क्षेत्रवार ब्‍यौरा इस प्रकार है:-

क्र. सं.

क्षेत्र

फैक्‍ट्रियों की संख्‍या

1.

सहकारी

329

2.

निजी

368

3.

सार्वजनिक

43

कुल

740*

*इसमें पश्‍चिम बंगाल और गुजरात में स्‍थित एक-एक रिफाइनरी शामिल है।


गन्‍ना मूल्‍य बकाया

यद्यपि चीनी मिलों द्वारा गन्‍ना किसानों को भुगतान विभिन्‍न कानूनी प्रक्रियाओं और राज्‍य सरकारों द्वारा लागू नियमों के माध्‍यम से घरेलू बाजार मूल्‍य की गतिशीलता तथा निर्यात संभावनाओं से संबंधित अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍थिति द्वारा प्रभावित होता है । 2010-11 से लगातार पाँच चीनी मौसमों से, सिवाय 2016-17 में जब उत्‍पादन, यद्यपि काफी कम रहा, लेकिन चीनी की कुल उपलब्‍धता जिसमें पिछले विशाल शेष स्‍टॉक शामिल थे, घरेलू आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त थे। वर्तमान चीनी मौसम 2017-18 के दौरान भी उत्‍पादन घरेलू आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त है। चीनी के सरप्‍लस उत्‍पादन होने की वजह से, घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में मंदी छाई रही जिससे चीनी मिलों की नकदी की स्थिति और गन्‍ना किसानों को गन्‍ना देयों का समय पर भुगतान करने की उनकी क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके परिणामस्‍वरूप, सरकार ने चीनी मिलों की नकदी को बढ़ाने के लिए विभिन्‍न स्‍कीमों को कार्यान्‍वित किया ताकि इन मौसमों के दौरान गन्‍ना मूल्‍य बकायों को न्‍यूनतम पर रखा जा सके। पिछले कुछ चीनी मौसमों के लिए एक ही निर्धारित तारीख को गन्‍ने के मूल्‍य के भुगतान तथा बकाया का विवरण इस प्रकार है:


मौसम

निम्‍न तारीख को स्‍थिति

कुल देय मूल्‍य

अदा किया गया कुल मूल्‍य

बकाया

देय मूल्‍य पर बकाया का %


2017-18

31/08/2018

84,880.12

70,961.18

13,918.94

16.40

2016-17

31/08/2017

56,988.40

53,484.72

3,503.68

6.15

2015-16

31/08/2016

60,000.86

55,580.76

4,420.10

7.37

2014-15

31/08/2015

65,496.40

51,354.10

14,142.30

21.59

2013-14

31/08/2014

57,654.74

49,459.68

8,195.06

14.21

2012-13

31/08/2013

59,497.97

55,953.55

3,544.42

5.96







सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्‍यम से अंत्‍योदय अन्‍न योजना (ए.ए.वाई) परिवारों के लिए चीनी के वितरण की मौजूदा प्रणाली की समीक्षा

राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों द्वारा चीनी का वितरण लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टी.पी.डी.एस) के माध्‍यम से राजसहायता प्राप्‍त मूल्‍यों पर किया गया था जिसके लिए इसमें भाग ले रहे राज्‍य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्र के प्रशासनों द्वारा 18.50/- रु प्रति. कि.ग्राम की दर से वितरित की जा रही चीनी की प्रतिपूर्ति केन्‍द्रीय सरकार द्वारा की जाती थी इस स्‍कीम के अन्‍तर्गत 2001 की जनगणना के अनुसार देश की समस्‍त बी पी एल जनसंख्‍या ओर उत्‍तर पूर्वी राज्‍यों/विशेष श्रेणी/पर्वतीय राज्‍यों और द्वीप समूह क्षेत्रों की जनसंख्‍या आती थी। राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (एन.एफ.एस.ए) को सभी 36 राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों द्वारा सार्वभौमिकता से कार्यान्वित किया जा रहा है। एन एफ एस के अन्‍तर्गत बी पी एल श्रेणी की पहचान नहीं की गई है, तथापि, अंत्‍योदय अन्‍न योजना (ए.ए.वाई) लाभार्थियों की स्‍पष्‍ट रूप से पहचान की गई है। भारत सरकार ने शर्करा सब्सिडी स्‍कीम की समीक्षा की है और यह निर्णय लिया है कि भोजन में ऊर्जा के स्रोत के रूप में चीनी के उपभोग को समाज के सबसे गरीब वर्ग अर्थात ए.ए.वाई परिवारों तक पहुँचाना अनिवार्य है। तदनुसार, केन्‍द्रीय सरकार ने निर्णय लिया है कि पी.डी.एस के माध्‍यम से चीनी वितरण की मौजूदा प्रणाली को निम्‍न रुप में जारी रखा जाए:-

(i) पी.डी.एस के माध्‍यम से राजसहायता प्राप्‍त चीनी की आपूर्ति की मौजूदा स्‍कीम को केवल ए.ए.वाई परिवारों के दायरे तक सीमित रखते हुए जारी रखा जाए। उन्‍हें प्रति परिवार हर महीने 1 कि.ग्रा. चीनी प्रदान की जाएगी।

(ii) केन्‍द्रीय सरकार द्वारा राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों को पी डी एस के माध्‍यम से चीनी के वितरण के लिए प्रदान की जाने वाली सब्सिडी का स्‍तर रु. 18.50/- प्रति कि.ग्राम का है जिसे ए.ए.वाई जनसंख्‍या के लिए जारी रखा जाएगा। राज्‍य/संघ राज्‍यक्षेत्र परिवहन, ढुलाई भाड़ा डीलर के कमीशन आदि पर हुए अतिरिक्‍त खर्च को रु. 13.50/- प्रति कि.ग्राम की खुदरा निर्गम कीमत से अधिक को लाभर्थियों के उपर डालें या स्‍वयं वहन करें।

संशोधित योजना 1.6.2017 से कार्यान्वित हो गई थी। इस योजना में बारह राज्य भाग ले रहे हैं वित्तीय वर्ष 2017-18 में 300 करोड़ रु. की चीनी सब्सिडी जारी की गई थी जबकि वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक 68.89 करोड़ रुपए की चीनी सब्सिडी जारी कर दी गई है।


चीनी का उत्‍पादन, खपत और स्‍टॉक

चीनी का उत्‍पादन

भारत में चीनी का उत्‍पादन चक्रीय प्रकृति का रहा है। प्रत्‍येक 2-3 वर्ष में चीनी का अधिकतम उत्‍पादन होता है तो फिर अगले दो-तीन वर्षों में चीनी का उत्‍पादन घट जाता है। चीनी मौसम 2010-11 से 2015-16 तक देश में चीनी के अधिक उत्‍पादन को निर्यात के लिए उपयोग में लाया गया जिससे इस प्रक्रिया के कारण कीमती विदेशी मुद्रा अर्जित हो सकी। परंतु पिछले दो चीनी मौसमों के दौरान महाराष्‍ट्र और कर्नाटक में लगातार सूखे जैसे स्थिति बनी रहने के कारण चीनी मौसम 2016-17 से पहले के दो चीनी मौसमों के दौरान चीनी का उत्‍पादन घरेलू मांग की तुलना में कम रहा। फिर भी पिछले मौसम का 77.10 लाख मी.टन का बचा हुआ स्‍टॉक और 202.27 लाख मी.टन का अनुमानित उत्‍पादन से चीनी की उपलब्‍धता घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त थी।

2013-14 से मौसम-वार चीनी का उत्‍पादन नीचे दिया गया है:-

चीनी मौसम

(अक्‍तूबर-सितम्‍बर)

चीनी का उत्‍पादन

(मात्रा लाख टन में)

2013-14

245.54

2014-15

284.63

2015-16

251.21

2016-17

202.27

2017-18(अनंतिम)

321.96


चीनी का अंतिम स्‍टॉक

2013-14 से प्रत्‍येक चीनी मौसम के अंत में चीनी का अंतिम स्‍टॉक नीचे दिया गया है:-

(मात्रा लाख टन में)

चीनी मौसम

अंतिम स्‍टॉक

2013-14

72.13

2014-15

88.76

2015-16

77.10

2016-17

39.37

2017-18 (अनंतिम)

111.33

पिछले पांच मौसमों का पिछला बचा हुआ स्‍टॉक, उत्‍पादन, आयात, उपलब्‍धता, अनुमानित आंतरिक खपत, अंतशेष स्‍टॉक का ब्‍यौरा नीचे दिया गया है:-

2013-14 चीनी मौसम से चीनी तुलन पत्र

(मात्रा लाख टन में)

विवरण

2013-14

2014-15

2015-16

2016-17

2017-18

()

चीनी मिलों के पास पिछले मौसम से लिया गया स्‍टॉक

91.09

72.13

90.00

77.10

39.37

चीनी का उत्‍पादन

245.54

284.63

251.21

202.27

321.96

चीनी का आयात

1.05

-

-

5.00

-

कुल अनुमानित उपलब्‍धता

337.68

356.76

341.21

284.37

361.33

आंतरिक खपत के लिए मिलों से प्रेषण

243.00

256.00

247.61

245.00

250.00

एएलएस/एएस बाध्‍यता और ओजीएल पर निर्यात

22.55

12.00

16.50

-

-

कुल अनुमानित रिलीज/प्रेषण

265.55

268.00

264.11

245.00

250.00

मौसम के अंत में चीनी मिलों के पास अनुमानित अंतिम शेष स्‍टॉक

72.13

88.76*

77.10

39.37

111.33

* न्यायालय आदेश के प्रति बेची गई क्षतिग्रस्त/ पसीजी चीनी के कारण एक चीनी मौसम का अंतशेष, दूसरे चीनी मौसम के प्रारंभिक शेष से अलग है।

(अ) अनन्तिम

चीनी के मिल-पूर्व और खुदरा मूल्‍य

2013-14 से 2017-18 तक चीनी मौसमों के दौरान देश के प्रमुख केन्‍द्रों पर चीनी (एस-30 ग्रेड) के मूल्‍यों का दायरा सीमा इस प्रकार रहा:-

चीनी मौसम

(अक्‍तू्बरसितम्बर)

*चीनी के मिल-पूर्व मूल्‍यों की सीमा (रुपए प्रति क्‍विंटल)

**चीनी के खुदरा मूल्‍य की सीमा (रुपए प्रति किग्रा.)

2013-14

2420 - 3300

31.00 - 36.00

2014-15

2050 - 2860

29.35 - 35.87

2015-16

2350 - 3500

30.55 - 41.00

2016-17

3391 - 3731

40.63 - 44.10

2017-18

2670 - 3660

36.34 – 43.36

(सितम्‍बर, 2018 तक)

स्रोत: * डेली ट्रेड मार्ट इन्‍क्‍वारी, शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय

**मूल्‍य निगरानी प्रकोष्‍ठ, उपभोक्‍ता मामले विभाग

चीनी का निर्यात

चीनी एक आवश्‍क वस्‍तु है । मिलों से इसकी बिक्री, डिलीवरी और वितरण सरकार द्वारा आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत विनियमित किया जाता था । दिनांक 15.01.1997 तक चीनी का निर्यात अधिसूचित भारतीय निर्यात एजेंसियों नामत: भारतीय चीनी एवं सामान्‍य उद्योग निर्यात-आयात निगम लिमिटेड (आई.एस.जी.आई.ई.आई.सी) तथा भारतीय राज्‍य व्‍यापार निगम लिमिटेड (एस.टी.सी) के माध्‍यम से चीनी निर्यात संवर्धन अधिनियम, 1958 के प्रावधानों के अंतर्गत किया जाता रहा ।

एक अध्‍यादेश के जरिये चीनी निर्यात संवर्द्धन अधिनियम, 1958 को 15 जनवरी, 1997 से निरस्‍त कर दिया गया था और इस प्रकार चीनी का निर्यात सारणी से हटा दिया गया था। सारणी से हटाने की व्‍यवस्‍था के अधीन, चीनी का निर्यात वाणिज्‍य मंत्रालय के अधीन कृषि तथा प्रसंस्‍कृत खाद्य उत्‍पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (अपेडा) के माध्‍यम से किया जा रहा था। उसके बाद विभिन्‍न चीनी मिलों/व्‍यापारी निर्यातकों द्वारा शर्करा निदेशालय से निर्यात रिलीज आदेश प्राप्‍त करने के पश्‍चात् चीनी का निर्यात किया गया।

2006-07 और 2007-08 के चीनी मौसमों के सरप्‍लस के चरण के दौरान, दिनांक 31.07.2007 की अधिसूचना द्वारा रिलीज आदेशों के बिना चीनी का निर्यात करने की अनुमति दी गई। तत्‍पश्‍चात्, 01.01.2009 से रिलीज आदेश प्राप्‍त करने की आवश्‍यकता को पुन: लागू किया गया क्‍योंकि देश में चीनी के उत्‍पादन में कमी होने के रूझान मिल रहे थे। तथापि 2010-11 चीनी मौसम के दौरान, अधिक चीनी के उत्‍पादन को ध्‍यान में रखते हुए रिलीज आदेश पर खुले सामान्य लाइसेंस (ओ.जी.एल) के अधीन चीनी को निर्यात करने की अनुमति दी गई।

चीनी का सरप्‍लस उत्‍पादन होने का चरण जारी रहा और सरकार ने दिनांक 11.05.2012 की अधिसूचना संख्‍या 1059 () द्वारा निर्यात रिलीज आदेश प्राप्‍त करने की आवश्‍यकता समाप्‍त कर दी। उसके बाद चीनी का निर्यात विदेश व्‍यापार महानिदेशालय (डी.जी.एफ.टी) के पास मात्रा का पूर्व पंजीकरण (आर.सी) करने पर मुक्‍त हो गया है। इसके बाद 7 सितंबर 2015 से पहले पंजीकरण करने की आवश्‍यकता को भी समाप्‍त कर दिया गया है। 2016-17 चीनी मौसम के दौरान चीनी के उत्‍दपादन में संभावित गिरावट के कारण, वर्तमान नीति के अंतर्गत चीनी का निर्यात ओ जी एल के तहत अब मुक्‍त कर दिया गया है बशर्तें कि 20% सीमा शुल्‍क का भुगतान किया जाए।

चीनी का आयात

चीनी का आयात जिसे मार्च, 1994 में बिना शुल्‍क के खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के अधीन रखा गया था, 27.04.1999 तक बिना सीमा शुल्‍क के जारी रहा। सरकार ने 28 अप्रैल, 1998 से आयात की गई चीनी पर 5 प्रतिशत सीमा शुल्‍क और 850/- रुपये प्रति टन की दर से प्रतिशुल्‍क लगाया। प्रतिशुल्‍क के अतिरिक्‍त, 14.04.1999 से सीमा शुल्‍क 5 प्रतिशत से बढ़ा कर 20 प्रतिशत कर दिया गया। वर्ष 1999-2000 के केन्‍द्रीय बजट में, आयात की गई चीनी पर शुल्‍क 20 प्रतिशत से और बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया था और इस पर 10 प्रतिशत का अधिभार लगा दिया गया था। चीनी के आयात पर सीमा शुल्‍क पुन: बढ़ाकर 30.12.1999 को 40 प्रतिशत और 9.2.2000 को 60 प्रतिशत कर दिया गया और इसके साथ 950 रुपये प्रति टन प्रतिशुल्‍क (1.3.2008 से) जमा 3 प्रतिशत शिक्षा उपकर भी बरकरार रहा।

चीनी मौसम 2008-09 में चीनी के उत्‍पादन में गिरावट रही है और चीनी के घरेलू स्‍टॉक को बढ़ाने के लिए केन्‍द्र सरकार ने शून्‍य शुल्‍क पर मुक्‍त सामान्‍य लाइसेंस (ओ.जी.एल) पर 17.04.2009 से कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी है जो 30.06.2012 तक लागू रही। उसके बाद 13.07.2012 से 10% के संतुलित शुल्क को पुन: लागू किया गया जिसे बाद में 08.07.2013 से बढ़ाकर 15% कर दिया गया। देश में चीनी का सरप्‍लस स्‍टॉक होने और किसी भी संभावित आयात को रोकने के क्रम में सरकार ने दिनांक 21.08.2014 से आयात शुल्‍क को 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किया जिसे बाद में 30.04.2015 से बढ़ाकर 40 प्रतिशत किया गया और इसे भी बाद में बढ़ाकर दिनांक 10.07.2017 से 50 प्रतिशत कर दिया गया जो अभी भी प्रचलन में है ।

चीनी की कीमतों को उचित स्‍तर पर बनाये रखने के लिए मांग और पूर्ति में क्षेत्रीय असंतुलनों को कम से कम रखने के क्रम में सरकार ने चीनी मिलों के द्वारा 8 लाख मी.टन कच्ची चीनी का 5 लाख मी.टन की दो किस्तों मे 0 प्रतिशत शुल्‍क पर तथा 3 लाख मी.टन 25 प्रतिशत शुल्‍क पर आयात करने और श्‍वेत चीनी को संशोधित करने तथा इसे घरेलू खपत के लिए उपलब्‍ध रखने की अनुमति प्रदान की थी । वर्तमान चीनी मौसम 2017-18, के दौरान चीनी का उत्‍पादन 270 लाख मी.टन रहने का अनुमान है जो घरेलू आवश्‍यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त है ।

डीजीसीआईएस कोलकाता द्वारा प्रकाशित सूचना के अनुसार, चीनी मौसम 2013-14 से 2016-17 तक चीनी की निर्यात/आयात की गई मात्रा नीचे दी गई है:-

चीनी का निर्यात

चीनी मौसम (अक्‍तू.-सित.)

मात्रा (लाख मी. टन में) *

2013-14

26.85

2014-15

24.32

2015-16

37.98

2016-17

21.30

चीनी का आयात

चीनी मौसम

मात्रा (लाख मी. टन में) *

2013-14

10.788

2014-15

12.82

2015-16

19.06

2016-17

26.82

* इसमें विशेष प्राधिकार स्‍कीम के अंतर्गत की मात्रा शामिल है

गन्‍ना पेराई पर उत्‍पादन सब्‍सिडी

सरकार ने दिनांक 02.12.2015 की अधिूसचना के तहत उपलब्धि पर आधारित उत्‍पादन सब्‍सिडी को अधिसूचित किया जिसे बाद में 12.09.2016 की अधिसूचना के तहत 2015-16 चीनी मौसम के दौरान 19.05.2016 तक (स्‍कीम के समापन की तारीख) गन्‍ना पेराई पर 4.50 रुपए प्रति क्‍विंटल की दर से सब्‍सिडी प्रदान करना था जिसे चीनी मिलों को चीनी के लक्षित निर्यात की उपलब्‍धि की संभाव्‍यता और एथनाल सम्‍मिश्रण कार्यक्रम (ई बी पी) के अंतर्गत (एथनॉल उत्‍पादन की क्षमता रखने वाली मिलों के मामले में) तेल विपणन कंपनियों को एथनाल की लक्षित आपूर्ति के लिए भी प्रदान की गई । वित्‍तीय वर्ष 2016-17 तक उत्‍पादन सब्‍सिडी स्‍कीम के अंतर्गत 207 चीनी मिलों को 511.90 करोड़़ रुपए संवितरित किए गए।


चीनी के मानक:

खाद्य और कृषि प्रभाग (एफ ए डी-2), भारतीय मानक ब्‍यूरो (बी आई एस), की शर्करा उद्योग अनुभागीय समिति, खाद्य और कृषि प्रभाग, बी आई एस के प्रमुख की सहमति से चीनी मिलों, व्यापार, सरकारी संगठनों, आदि द्वारा वर्ष प्रति वर्ष प्रयोग के लिए भारतीय शर्करा के मानकों की सिफारिश करती है और चीनी और अन्‍य संबंधित मामलों के विभिन्‍न ग्रेडों के लिए कीमत विभेदकों की समीक्षा भी करती है ।


-सुशासन पहल

चीनी क्षेत्र में डाटा प्रबंधन प्रणाली में सुधार लाने और इसे व्‍यवस्‍थित करने के लिए खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग में शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय ने मासिक आधार पर चीनी मिलों द्वारा सूचनाओं को ऑनलाइन प्रस्‍तुत करने के लिए वेब आधारित प्‍लेटफार्म (esugar.nic.in/sugar_pII) विकसित किया है। इससे सरकार को चीनी क्षेत्र के बेहतर प्रबंधन के लिए त्‍वरित और नीतिगत निर्णय लेने में सहायता मिली है। इस नई प्रणाली से चीनी मिलों के डाटा प्रबंधन के साथ-साथ सरकार के काम करने में पारदर्शिता दिखाई देती है। यह पोर्टल उत्‍पादन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए लेवी चीनी के स्‍टॉक का उपयोग, अर्धमासिक आधार पर चीनी मिलों का गन्‍ना मूल्‍य बकाया इत्‍यादि से संबंधित सूचना प्राप्‍त करने के लिए राज्‍य सरकारों के साथ ऑनलाइन संपर्क साधने हेतु विंडो मुहैया कराती है।

(ख) तेल प्रभाग

हमारे बारे में

यह देश में खाद्य तेलों के प्रबंधन की बहुआयामी रणनीति का समन्‍वय करता है अर्थात (i) घरेलू स्रोतों से खाद्य तेलों और इसकी उपलब्‍धता हेतु मांग का मूल्‍यांकन करना। मांग और पूर्ति के असंतुलन को खाद्य तेलों के आयात से पूरा किया जाता है ताकि उचित स्‍तर पर उनके मूल्‍यों को बरकरार रखा जाए; (ii) यह खाद्य तेलों के मूल्‍यों को घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार दोनों पर बारीकी से निगरानी रखता है और जब भी जरूरत होती है आवश्‍यक नीतिगत उपायों के लिए पहल करता है। यह प्रभाग निदेशालय के पास पंजीकृत वनस्‍पति तेल उद्योगों द्वारा ऑनलाइन से प्रस्‍तुत किए गए आंकड़ों के आधार पर खाद्य तेलों के उत्‍पादन को एकत्र करता है। खाद्य तेलों के इस मासिक उत्‍पादन के आंकड़ों को औद्योगिक उत्‍पादन के सूचकांक (आई.आई.पी) के संकलन के लिए सांख्‍यकीय और कार्यक्रम कार्यान्‍वयन मंत्रालय को भेजा जाता है जिसे प्रत्‍येक महीने की 12 तारीख को जारी किया जाता है। यह प्रभाग योग्‍य तकनीकी कार्मिकों से सुसज्‍जित है, जोकि मंत्रालय को खाद्य तेलों के समन्‍वित प्रबंधन, विशेष रूप से उत्‍पादन/उपलब्‍धता और कीमतों की निगरानी/नियंत्रण से संबंधित कार्यों में सहायता करता है।

खाद्य तेल परिदृश्‍य

देश की अर्थव्‍यवस्‍था में खाद्य तेलों का महत्‍व

तिलहन और खाद्य तेल दो अत्‍यधिक संवेदनशील आवश्‍यक वस्‍तुएं हैं। भारत विश्‍व में तिलहनों के सबसे बड़े उत्‍पादकों में से एक है और यह क्षेत्र कृषि अर्थव्‍वस्‍था में एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखता है । अनुमानित उत्‍पादन का हिसाब लगाया जाए तो 16.08.2017 को कृषि मंत्रालय द्वारा जारी चौथे अग्रिम अनुमान के अनुसार वर्ष 2016-17 (नवम्‍बर-अक्‍तूबर) के दौरान नौ तिलहनों की खेती से 32.09 मिलियन टन तिलहनों का अनुमानित उत्‍पादन हुआ। विश्‍व तिलहन उत्‍पादन में भारत का लगभग 6-7% अंश है। वित्‍तीय वर्ष 2016-17 में लगभग 3.28 मिलियन टन डी-ऑयल्ड केक (खली), तिलहन और लघु तेलों का निर्यात हुआ जिसकी कीमत 15294 करोड़ रुपए आंकी गई है।


भारत में सामान्‍यतया प्रयुक्‍त होने वाले तेलों की किस्‍में

भारत अपनी विभिन्‍न कृषि जलवायु वाले क्षेत्रों में उगाई जाने वाली तिलहन फसलों की व्‍यापक सीमाओं के लिए भाग्‍यशाली है। मूंगफली, सरसों/सफेद सरसों, तिल, कुसुम, अलसी, काले तिल का तेल/एरण्‍डी का तेल प्रमुख परंपरागत रूप से उगाए जाने वाले तिलहन हैं। हाल ही के वर्षों में सोयाबीन और सूरजमुखी ने भी महत्‍वपूर्ण स्‍थान ले लिया है। नारियल सभी पौधरोपित फसलों में सबसे महत्‍वपूर्ण है। केरल और अंडमान और निकोबार द्वीप समूहों सहित आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु देश के उत्‍तर-पूर्वी भाग में आयल पाम उगाने के प्रयास किए जा रहे हें। गैर-परंपरागत तेलों में राइसब्रान तेल और बिनौला तेल अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्‍त पेड़ों और वन मूल के तिलहनों, जो ज्‍यादातर आदिवासी वसागत क्षेत्रों में उगाए जाते हैं, तिलहनों के महत्‍वपूर्ण स्रोत हैं। पिछले 10 वर्षों के दौरान प्रमुख तिलहनों की खेती से अनुमानित उत्‍पादन, सभी घरेल स्रोतों से खाद्य तेलों की उपलब्‍धता (घरेलू और आयात स्रोतों से) से संबंधित आंकड़े नीचे दिए गए है:-

(मात्रा लाख टनों में)

तेल वर्ष

(नव-अक्‍तू)

तिलहनों का उत्‍पादन*

समस्‍त घरेलू स्रोतों से खाद्य

तेलों की निवल उपलब्‍धता

आयात**

खाद्य तेलों की कुल उपलब्‍धता

2008-09

277.19

84.56

74.98

159.54

2009-10

248.83

79.46

74.64

154.10

2010-11

324.79

97.82

72.42

170.24

2011-12

297.98

89.57

99.43

189.00

2012-13

309.43

92.19

106.05

198.24

2013-14

328.79

100.80

109.76

210.56

2014-15

266.75

89.78

127.31

217.09

2015-16

252.50

86.30

148.50

234.80

2016-17

312.76

100.99

153.17

254.16

2017-18

306.38*

101.69

104.00

(जुलाई,

2018 तक)

स्रोत: *कृषि मंत्रालय द्वारा जारी (दिनांक 16.08.2017) के चौथे अग्रिम अनुमान के अनुसार

** वाणिज्‍यिक आसूचना एवं सांख्‍यिकीय महानिदेशालय

भारत में खाद्य तेलों की खपत का ढांचा

भारत एक विशाल देश है और इसके विभिन्‍न क्षेत्रों के निवासियों ने ऐसे कुछ तेलों के लिए खास पसंद विकसित की है जो अधिकतर उस क्षेत्र में उपलब्‍ध तेलों पर निर्भर करता है। उदाहरणत: दक्षिण और पश्‍चिम के लोग मूंगफली का तेल पसंद करते हैं, जबकि पूर्व और उत्‍तर वाले सरसों/सफेद सरसों का प्रयोग करते हैं। इसी तरह दक्षिण के कई क्षेत्रों में नारियल और तिल के तेल को पसंद करते हैं। उत्‍तरी मैदानों में बसे लोग मूलत: वसा के उपभोक्‍ता है और इसलिए वनस्‍पति को ही पसंद करते हैं जिसमें सोयाबीन, सूरजमुखी, राइसब्रान तेल और बिनौला तेल जैसे तेलों के आंशिक रूप से हाइड्रोजेनेटेड खाद्य तेल मिश्रण को प्रयोग में लाया जाता है। पेड़ और वन मूल के तिलहनों में से कई नए तेलों ने वनस्‍पति के जरिए खाद्य पूल में काफी हद तक अपना रास्‍ता बना लिया है। इसके बाद स्‍थितियां काफी बदल गई है। आधुनिक तकनीकी साधनों के माध्‍यम से जैसे कि वास्‍तविक परिष्‍करण, ब्‍लीचिंग और डी-ओडराइजेशन से सभी तेल व्‍यावहारिक रूप से रंगहीन, सुगंधरहित और स्‍वादरहित होते हैं और इसलिए रसोईघर में आसानी से आपस में बदल लिए जाते हैं। तेल जैसे-सोयाबीन, बिनौला, सूरजमुखी, राइसब्रान, पाम तेल और उसके तरलांश पामोलीन जिसको पहले जाना भी नहीं जाता था वे अब रसोईघर में प्रवेश कर गए है। खाद्य तेल बाजार में कच्‍चे तेल, परिष्‍कृत तेल और वनस्‍पति का कुल अंश मोटे तौर पर क्रमश: 35%, 60% और 05% अनुमानित है। खाद्य तेलों की घरेलू मांग का लगभग 60% आयात से पूरा किया जाता है जिसमें से पाम तेल/पामोलीन का लगभग 61% हिस्‍सा है। पिछले कुछ वर्षों में परिष्‍कृत पामोलीन (आर बी डी पामोलीन) की खपत के साथ-साथ अन्‍य तेल के साथ उसका मिश्रण काफी हद तक बढ़ गया है और होटल, रेस्‍टोरेन्‍ट और विभिन्‍न प्रकार के खाद्य उत्‍पादों को बनाने में बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल किया जाता है।

खाद्य तेल अर्थव्यवस्‍था की प्रमुख विशेषताएं

इसकी दो प्रमुख विशेषताएं है, जिसने इस क्षेत्र के विकास में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है। पहला था 1986 में तिलहनों पर प्रौद्योगिकी मिशन की स्‍थापना जिसे 2014 में तिलहनों और तेल पाम (एनएमओओपी) पर राष्‍ट्रीय मिशन में बदल दिया गया। इससे तिलहनों के उत्‍पादन को बढ़ाने में सरकारी प्रयासों को चुनौती मिली। तिलहनों के उत्‍पादन में 1986-87 में लगभग 11.3 मिलियन टन से 2017-18 में 30.64 मिलियन टन की बहुत प्रभावशाली वृद्धि से यह प्रमाणित हो जाता है। अधिकतर तिलहनों की खेती सीमांत भूमि पर की जाती है और वह वर्षा और अन्‍य मौसमी दशाओं पर निर्भर होता है। अन्‍य प्रभावी विशेषता जिसका खाद्य तिलहनों,तेल उद्योग की वर्तमान स्‍थिति पर महत्‍वपूर्ण प्रभाव पड़ा, वह था उदारीकरण कार्यक्रम जिसके अंतर्गत सरकार की आर्थिक नीति ने खुले बाजार को अधिकांशत: स्‍वतंत्रता प्रदान करते हुए तथा सुरक्षा और नियंत्रण के बजाए स्‍वस्‍थ स्‍पर्धा और स्‍व विनियमन को प्रोत्‍साहित किया है। नियंत्रणों और विनियमों में ढील दी गई है जिसके परिणामस्‍वरूप घरेलू और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों दोनों द्वारा बाजार को अत्‍यंत प्रतिस्‍पर्धात्‍मक बना दिया गया है।

खाद्य तेलों पर निर्यात-आयात नीति

मांग और आपूर्ति के अंतर को पूरा करने के लिए देश को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। खाद्य तेल का आयात, खुले सामान्य लाइसेन्स के तहत है। किसानों, संसाधकों और उपभोक्ताओं के हितों को संगत बनाने के क्रम में साथ ही जहां तक संभव हो खाद्य तेलों के बड़े आयात को विनियमित करने के लिए खाद्य तेलों पर आयात शुल्क ढांचे की समय-समय पर समीक्षा की जाती है। 14.06.2018 से सभी कच्चे और रिफाइंड खाद्य तेलों पर आयात शुल्क क्रमशः 35% और 45% तक बढ़ा दिया गया था जबकि जैतून के तेल पर आयात शुल्क 40% तक बढ़ा दिया था। कच्चे और रिफाइंड ताड़ के तेल पर आयात शुल्क क्रमशः 44% और 54% ही रहा था।

देश में खाद्य तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के क्रम में लिए खाद्य तेल के निर्यात पर 17.03.2008 से प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसे समय-समय पर बढ़ाया गया था। 06.02.2015 से थोक में राइसब्रान तेल के निर्यात को, अनुमत किया गया था। 27.03.2017 से मूँगफली के तेल, तिल के तेल, सोयाबीन तेल और मक्के के तेल के निर्यात की अनुमति दी गई थी। 06.04.2018 से सरसों के तेल को छोड़कर सभी खाद्य तेलों के निर्यात को अगले आदेश तक बिना किसी मात्रात्मक, पैक साइज़ आदि की बंदिश के निःशुल्क कर दिया गया। 5 किलो तक के पैकों में न्‍यूनतम निर्यात मूल्‍य 900 प्रति मी.टन अमेरिकी डालर के साथ सरसों के तेल के निर्यात की अनुमति दी गई है।


तेल का नाम

आयात शुल्क की दर/प्रभावी तिथियां

कच्‍चा पाम तेल

0%

(01/04/08)

0%

(17/03/12)

2.5%

(23/01/13)

2.5%

(23/01/13)

7.5%

(24/12/14)

12.5%

(17/09/15)

7.5%

(23/09/16)

15%

(11/08/ 17)

30%

(17/11/17)

44%

(01/3/18)

आरबीडी पामोलीन

7.5

(01/04/08)

7.5 %

(17/03/12)

7.5 %

(17/03/12)

10%

(20/01/14)

15%

(24/12/14

20%

(17/09/15)

15%

(23/09/16)

25%

(11/08/17)

40%

(17/11/17)

54%

(01/3/18)

कच्‍चा सोयाबीन तेल

0%

0%

(17/03/12)

2.5%

(23/01/13)

2.5%

(23/01/13)

7.5%

(24/12/14

12.5%

(17/09/15)

12.5%

(17/09/15)

17.5%

(11/08/17)

30%

(17/11/17)

35%

(14/06/18)

परिष्‍कृत सोयाबीन तेल

7.5%

7.5 %

(17/03/12)

7.5 %

(17/03/12)

10%

(20/01/14)

15%

(24/12/14

20%

(17/09/15)

20%

(17/09/15)

20%

(11/08/17)

35%

(17/11/17)

45%

(14/06/18)

कच्‍चा सूरजमुखी तेल

0%

0%

(17/03/12)

2.5%

(23/01/13)

2.5%

(23/01/13)

7.5%

(24/12/14

12.5%

(17/09/15)

12.5%

(17/09/15)

12.5%

(17/09/15)

25%

(17/11/17)

35%

(14/06/18)

परिष्‍कृत सूरजमुखी तेल

7.5%

7.5 % (1

7/03/12)

7.5 %

(17/03/12)

10%

(20/01/14)

15%

(24/12/14

20%

(17/09/15)

20%

(17/09/15)

20%

(17/09/15)

35%

(17/11/17)

45%

(14/06/18)

कच्‍चा सफ़ेद सरसों तेल

0%

0%

(17/03/12)

2.5%

(23/01/13)

2.5%

(23/01/13)

7.5%

(24/12/14

12.5%

(17/09/15)

12.5%

(17/09/15)

12.5%

(17/09/15)

25%

(17/11/17)

35%

(14/06/18)

परिष्‍कृत सफ़ेद सरसों तेल

7.5%

7.5 %

(17/03/12)

7.5 %

(17/03/12)

10%

(20/01/14)

15%

(24/12/14

20%

(17/09/15)

20%

(17/09/15)

20%

(17/09/15)

35%

(17/11/17)

45%

(14/06/18)

अन्य

-

-

-

-

-

-

-

-

कच्‍चा -30% परिष्‍कृत -35% (2/2/18)

कच्‍चा -35% परिष्‍कृत -45% (14/06/18)

स्रोत: जैसा कि राजस्व विभाग ने अधिसूचित किया है।

खाद्य तेलों के संबंध में 2017-18 के दौरान हाल ही में लिए गए प्रमुख निर्णय:-

  1. दिनांक 14 जून,2018 की अधिसूचना सं. 47/2018-सीमा शुल्क के माध्यम से ताड़ के तेल को छोड़कर सभी कच्चे और परिष्कृत तेलों पर आयात शुल्क बढ़ाकर क्रमशः 35% और 45% कर दिया गया है, जैतून के तेल पर आयात शुल्क बढ़ाकर 40% कर दिया गया है।
  2. दिनांक 06.04.2018 की अधिसूचना सं. 01/2015-20 के माध्यम से सरसों के तेल को छोड़कर सभी खाद्य तेलों के निर्यात को अगले आदेश तक बिना किसी मात्रात्मक, पैक साइज़ आदि की बंदिश के निःशुल्क कर दिया गया। 5 किलो तक के पैकों में सरसों के तेल के निर्यात की अनुमति दी गई है बशर्तें कि न्‍यूनतम निर्यात मूल्‍य 900 प्रति मी.टन अमेरिकी डालर हो।
  3. दिनांक 01.03.2018 की अधिसूचना सं. 29/2018 के माध्यम से कच्चे ताड़ के तेल पर सीमा-शुल्क बढ़ाकर 44% और परिष्कृत ताड़ के तेल/ पामोलीन पर सीमा-शुल्क बढ़ाकर 54% कर दिया गया है।
  4. 5 अगस्त, 2011 से एफ.एस.एस.ए.आई अधिनियम, 2006 के कार्यान्‍वयन से, खाद्य तेल उद्योग अब लाइसेंस जारी करने, सुरक्षा और मानक मानदंडों, के लिए एफ.एस.एस.ए.आई द्वारा शासित किया जाता है। हालांकि, खाद्य तेल उद्योगों के लिए प्रापण के आंकड़ों की मॉनीटरिंग की व्‍यवस्‍था वनस्‍पति तेल उत्‍पाद, उत्‍पादन और उपलब्‍धता (विनियमन) आदेश, 2011 के तहत (वी.ओ.पी.पी.ए) निदेशालय द्वारा की जाती है।

ई-सुशासन की पहल

वनस्‍पति तेल क्षेत्र में आंकड़े प्रबंधन प्रणाली में सुधार और सुव्‍यवस्‍थित करने के क्रम में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के अंतर्गत शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय ने वनस्‍पति तेल उत्‍पादकों द्वारा मासिक आधार पर आनलाइन सूचना प्रस्‍तुत करने के लिए वैब आधारित प्‍लेटफार्म (evegoils.nic.in) विकसित किया है। इससे सरकार को वनस्‍पति तेल क्षेत्र के अच्‍छे प्रबंधन के लिए त्‍वरित और प्रभावकारी नीति निर्णयों को लेने में मदद मिली है। इस नई प्रणाली से वनस्‍पति तेल उद्योग के आंकड़े प्रबंधन के साथ-साथ सरकार के कार्यों में पारदर्शिता भी देखने को मिलती है। यह पोर्टल आन लाइन पंजीकरण और मासिक उत्‍पादन विवरण को प्रस्‍तुत करने के लिए विंडो प्रदान करता है।

वनस्‍पति तेल उद्योग की स्‍थिति (27.08.2018 को)

1. वनस्‍पति तेल उत्‍पाद, उत्‍पादन और उपलब्‍धता (विनियमन) आदेश, 2011 के तहत निदेशालय के साथ पंजीकृत वनस्‍पति तेल उद्योग का प्रकार

उद्योग का प्रकार

पंजीकृत इकाइयों की संख्‍या

1. वनस्‍पति, इंटेरेस्‍टेफाइड वनस्‍पति तेल और वसा

100

2. विलायक संयंत्र और तेल मिलों के साथ रिफाइनरी

220

3. तेल मिल और सम्‍मिश्रित खाद्य वनस्‍पति तेल

313

4. विलायक निष्‍कर्षण इकाईयां

127

कुल

760

अभिलेख

2007 से खाद्य तेलों और वसा के संबंध में लिए गए प्रमुख निर्णय

1. दिनांक 24.01.2007 की अधिसूचना सं.सी.यू.एस.एन.टी.एफ.सं. 08.2007 के द्वारा कच्‍चे पाम तेल/कच्‍चे पामोलीन पर आयात शुल्‍क 70% से घटाकर 60% कर दिया गया है, परिष्‍कृत पाम तेल/आर.बी.डी पामोंलीन पर आयात शुल्‍क 80% से घटाकर 67.5% कर दिया गया है, कच्‍चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्‍क 75% से घटाकर 65% कर दिया गया है और परिष्‍कृत सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्‍क 85% से घटाकर कर 75% दिया गया है।



2. 01.03.2007 से कच्‍चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्‍क 65% से घटाकर 50% कर दिया गया और परिष्‍कृत सूरजमुखी तेल और अन्‍य तेलों पर आयात शुल्‍क 75% से घटाकर 60% कर दिया गया। इसके अलावा, खाद्य तेलों (सोयाबीन तेल, सफेद सरसों का तेल और सरसों के तेल को छोड़कर) पर कुल सीमा शुल्‍क के 3% का शिक्षा उपकर लगेगा। 01.04.2007 से सभी खाद्य तेलों पर 4% की दर से विशेष अतिरिक्‍त सीमा शुल्‍क नहीं लगेगा।

3. 13.04.2007 से कच्‍चे पाम तेल/कच्‍चे पामोलीन तेल पर आयात शुल्‍क को 60% से घटाकर 50% कर दिया गया है और परिष्‍कृत पाम तेल/आर.बी.डी पर आयात शुल्‍क को 67.5% से घटाकर 57.5% कर दिया गया है।

4. 23.07.2007 से कच्‍चे पाम तेल/पामोलीन और रिफाइंड पाम तेल/पामोलीन पर आयात शुल्‍क क्रमश: 50% से घटाकर 45% और 57.5% से घटाकर 52.5% कर दिया गया है तथा कच्‍चे और परिष्‍कृत सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्‍क क्रमश: 50% से घटाकर 40% और 60% से घटाकर 50% कर दिया गया है एवं कच्‍चे और परिष्‍कृत सोयाबीन तेल पर आयात शुल्‍क 45% से घटाकर 40% कर दिया गया है।

5. दिनांक 12.06.2000 और 21.04.2003 के विगत आदेशों में घरेलू तेलों के इस्‍तेमाल का न्‍यूनतम स्‍तर और वनस्‍पति में निष्‍कर्षित सरसों के तेल के इस्‍तेमाल का अधिकतम स्‍तर निर्धारित किया गया था, को वनस्‍पति तेल उत्‍पाद (वियिमन) आदेश, 1990 के प्रावधानों के तहत दिनांक 11.02.2008 की आदेश सं. 45 – वीपी(2)/99 के माध्‍यम से विखंडित किया गया है। अत: आज तक वनस्‍पति के उत्‍पादन में निष्‍कर्षित सरसों के तेल साहित घरेलू तेलों के उपयोग के संबंध में कोई अनिवार्य बाध्‍यता नहीं है।

6. 21.03.2008 से कच्‍चे पाम तेल/पामोलीन और परिष्‍कृत पाम तेल पामोलीन पर आयात शुल्‍क को क्रमश: 45% से घटाकर 20% और 52% से 27.5% कर दिया गया है तथा कच्‍चे और परिष्‍कृत सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्‍क को क्रमश: 40% से घटाकर 20% और 50% से 27.5% कर दिया है एवं कच्‍चे और परिष्‍कृत सरसों/सफेद सरसों के तेल पर आयात शुल्‍क को क्रमश: 75% से घटाकर 20% और 75% से 27.5% से कर दिया गया है।

7. 1 अप्रैल 2008 से पाम तेल/ पामोलीन, पाम-गरी का तेल, सोयाबीन तेल, सफेद सरसों/सरसों का तेल, सूरजमुखी तेल, कुसुम्‍ब का तेल, मूंगफली का तेल, नारियल तेल और अन्‍य कई वनस्‍पति तेलों के कच्‍चे और परिष्‍कृत रूपों पर सीमा शुल्‍क को वित्‍त मंत्रालय, राजस्‍व विभाग द्वारा जारी अधिसूचना सं. 42/2008 – सी.शु. के माध्‍यम से घटाकर क्रमश: शून्‍य प्रतिशत और 7.5% कर दिया गया है।

8. डी.जी.एफ.टी ने अधिूसचना सं.अ 122/2008 –सी.शु. के माध्‍यम से 18.11.2008 से डीगम किए गए सोयाबीन तेल पर सीमा शुल्‍क को बढ़ाकर 20% कर दिया है। हालांकि डी.जी.एफ.टी अधिसूचना सं. 27/2009 सी.शु के माध्‍यम से 24.03.2009 से सीमा शुल्‍क घटाकर शून्‍य कर दिया गया। कच्‍चे तेलों पर 0% और परिष्‍कृत तेलों पर 7.5% की शुल्‍क संरचना को जारी रखा गया है।

9. डी.जी.एफ.टी ने दिनांक 17, मार्च 2008 की अधिूसचना सं. 85(आर.ई.2007)/2004-2009 के माध्‍यम से अनुसूची I के अध्‍याय 15 के अन्‍तर्गत आने वाले सभी खाद्य तेलों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि, वर्ष की अवधि के लिए वाणिज्‍य मंत्रालय द्वारा जारी दिनांक 1.4.2008 अधिूसचना सं.अ 92(आर.ई.2007) के माध्‍यम से एरंडी तेल (गैर-खाद्य श्रेणी का), नारियल तेल (कोचीन बंदरगाह से) और छोटे वन मूल से उत्‍पादित कुछ खास तेलों (यथा, कोकम तेल, वसा, साल तेल वसा. स्‍टेराइन, धूप तेल, नीम का तेल, आम की गरी का तेल, स्‍टेराइन नाइजर तेल, , संसाधित या परिष्‍कृत साल वसा) के संबंध में प्रतिबंध हटा दिया है। दिनांक 17.4.2009 की अधिसूचना सं. 98 (आर.ई-2008)/2004-09 के माध्‍यम से निर्यात पर प्रतिबंध को 16.03.2010 तक बढ़ा दिया गया था। डी.जी.एफ.टी की अधिूसचना सं.अ 39(आर.ई.-2008)/2004-2009 के माध्‍यम दिनांक 20.11.2009 से मछली के तेल के निर्यात की अनुमति दी है। अधिसूचना सं. 98(आर.ई.2008)/2004-09 के माध्‍यम से लगाए गए प्रतिबंध को दिनांक 4 सितम्‍बर, 2010 की अधिसूचना सं. 04/2009-2014 के माध्‍यम से 30.09.2010 तक बढ़ाया गया। दिनांक 04.09.2009 को अधिसूचना सं. 04/2009-2014 के माध्‍यम से लगाए गए प्रतिबंध को दिनांक 30 सितम्‍बर, 2010 की अधिूसचना सं. (आर.ई-2010) के माध्‍यम से 30.09.2011 तक बढ़ाया गया था। दिनांक 28 सितम्‍बर, 2011 की अधिसूचना सं. 77 (आर.ई-2010)/2009-14 के माध्‍यम से उक्‍त छूट के साथ खाद्य के साथ खाद्य तेलों के निर्यात पर प्रतिबंध को 30.09.2012 तक बढ़ा दिया गया था। दिनांक 19 अक्‍टूबर, 2012 की अधिसूचना सं. 24 (आर.ई-2012)/2009-14 के माध्‍यम से खाद्य तेलों के निर्यात पर प्रतिबंध को अगले के आदेशों तक बढ़ा दिया गया।

10. डी.जी.एफ.टी ने अधिूसचना सं.अ 60(आर.ई.2008)/2004-2009 के माध्‍यम से 20.11.2008 से, 31.10.2009 तक अगले एक वर्ष के दौरान 10000 टन की सीमा के अधीन 5 कि.ग्रा. तक के ब्रांडेड उपभोक्‍ता पैकों में खाद्य तेलों के निर्यात की अनुमति दी है। इसे 1.11.2010 सं 31.10.2011 तक बढ़ाया गया था और फिर 1.11.2010 से 31.10.2011 तक बढ़ाया गया। दिनांक 28 सितम्‍बर, 2011 की अधिसूचना सं. 77 (आर.ई-2010)/2009-14 के माध्‍यम से 10,000 टन की उच्‍चतम सीमा के साथ ब्रांडेड उपभोक्‍ता पैकों में खाद्य तेलों के निर्यात को 01.11.2011 से 31.10.2012 तक बढ़ा दिया गया। 17.03.2008 से प्रतिबंधित खाद्य तेलों के निर्यात को दिनांक 19 अक्‍टूबर 2012 की अधिूसचना सं. 24 (आर.ई-2012)/2009-14 के माध्‍यम से अगले के आदेशों तक बढ़ाया गया। दिनांक 5 फरवरी, 2013, अधिसूचना सं. 32 (आर.ई.2012)/2009-14, के तहत एरंडी के तेल, सभी ई.डी.आई बंदरगाहों से और भूमि सीमा-शुल्‍क स्‍टेशनों (एल.एी.एस) के माध्‍यम से नारियल तेल, लघु वन उत्‍पाद से उत्‍पादित कुछ तेलों को 5 कि.ग्रा. तक के ब्रांडेड उपभोक्‍ता पैकों में खाद्य तेलों के निर्यात और पर लगे प्रतिबंध से छूट दी गई है, बशर्ते कि 1500 अमरीकी डॉलर प्रति टन की कीमत पर न्‍यूनतम निर्यात की अनुमति दी जाए। इसके आलावा दिनांक 9 अक्‍टूबर, 2013 की अधिसूचना सं. 45 (आर.ई.2013)/2009-2014 के माध्‍यम से 5 कि.ग्रा. तक के ब्रांडेड उपभोक्‍ता पैकों में खाद्य तेलों के निर्यात पर एम.ई.पी को अमरीकी डॉल्‍र 1400 प्रति मी.टन तक घटा दिया है। इसे दिनांक 30 अप्रैल, 2014 की अधिूसचना सं. 80 ( आर.ई.2013)/2009-2014 के माध्‍यम से और अमरीकी डॉलर 1100 तक घटाया गया।

11. 7 अप्रैल, 2008 से खाद्य तेलों/तिलहनों के संबंध में राज्‍य सरकारों को स्टॉक प्रतिबंधों को पुन: लगानें के लिए अधिकृत किया गया जिसे 30.9.2015 तक बढ़ाया गया।

12. खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों से समाज के गरीब वर्ग को राहत दिलाने के लिए, केन्‍द्रीय सरकार ने प्रति माह, प्रति राशन कार्ड पर 01 कि.ग्रा. की दर पर राज्‍य सरकारों के माध्‍यम से 15 रुपए प्रति कि.ग्रा. की सब्सिडी पर 2008-09 में 10 लाख टन खाद्य तेलों के वितरण के लिए योजना का आरंभ किया है। योजना को 2009-10, 2010-2011, 2011-12 के दौरान और 2012-13 में 30.09.2013 तक बढ़ाया गया। योजना के कार्यान्‍वयन के बाद खाद्य तेलों की कीमतों में काफी गिरवट आई और गरीब वर्गों को रियासती दरों पर खाद्य तेल प्रदान किए गए।

13. खाद्य तेलों के गैर-कानूनी आयातों को रोकने के लिए, सरकार ने वित्‍त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचनाओं के माध्‍यम से उनके आयात पर शुल्‍क दर निर्धारित की और समय-समय पर संशोधित किया। सरकार ने 2006 से बंद की गई शुल्‍क दर को वर्तमान अंतर्राष्‍ट्रीय कीमतों के समान रखने के लिए फिर से शुरु करने का निर्णय लिया जिससे खाद्य तेलों की घरेलू उपलब्‍धता को बढ़ाने और रिफाइनिंग उद्योग की बेहतर क्षमता उपयोग में सहायता होगी। शुल्‍क मूल्‍य को पाक्षिक तौर पर संशोधित किया जाता है।

14. विभाग के व्‍यवसाय के नियमों की बाध्‍यताओं को पूरा करने के लिए आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम 1955 की धारा 3 के तहत नया आदेश यथा, वनस्‍पति तेल उत्‍पाद, उत्‍पादन एवं उपलब्‍धता (विनियमन) आदेश 2011 को (जी.एस.आर. 664-ई), 7 सितम्‍बर 2011 को अधिसूचित किया गया था।

15. दिनांक 23 जनवरी, 2013 की अधिसूचना सं. 02/2013- सीमा शुल्‍क के माध्‍यम से कच्‍चे खाद्य तेलों पर आयात शुल्‍क 0% से बढा़कर 2.5% कर दिया गया है।

16. दिनांक 20 जनवरी, 2014 की अधिसूचना सं. 02/2014-सीमा शुल्‍क के माध्‍यम से रिफाइंड खा़द्य तेलों पर आयात शुल्‍क 7.5% से बढ़ाकर 10.0% कर दिया गया।

17. दिनांक 24 दिसम्‍बर 2014 की अधिसुचना सं. 34/2014- सीमा शुल्‍क के माध्‍यम से कच्‍चे तेलों पर आयात शुल्‍क 2.5% से बढ़ाकर 7.5% कर दिया गया और रिफाइंड खाद्य तेलों पर आयात शुल्‍क 10.0% से 15.0% कर दिया गया।

18. दिनांक 17 सितम्‍बर 2015 की अधिसूचना सं. 46/2015- सीमा शुल्‍क के माध्‍यम से कच्‍चे तेलों पर आयात शुल्‍क 7.5% से बढ़ाकर 12.5% कर दिया गया और रिफाइंड खाद्य तेलों पर आयात शुल्‍क 15.0% से 20.0% तक कर दिया गया।

19. दिनांक 23 सितम्‍बर 2016 की अधिसूचना सं. 51/2016- सीमा शुल्‍क के माध्‍यम से कच्‍चे पाम तेल पर आयात शुल्‍क 12.5% से घटाकर 7.5% कर दिया गया है और रिफाइंड पाम तेलों पर आयात शुल्‍क 20.0% से घटाकर 15.0% कर दिया गया है।

20. दिनांक 11 अगस्‍त, 2017 की अधिसूचना सं. 71/2017-सीमा शुल्‍क के माध्‍यम से कच्‍चे पाम तेल पर आयात शुल्‍क 7.5% से बढ़ाकर 15% कर दिया गया और रिफांइड पाम तेलों पर आयात शुल्‍क 15.0% से बढ़ाकर 25.0% कर दिया गया। कच्‍चे सोयाबीन तेल पर आयात शुल्‍क 12.5% से बढ़ाकर 17.5% कर दिया गया।

21. दिनांक 17 नवंबर, 2017 की अधिसूचना सं. 87/2017-सीमा शुल्‍क के माध्‍यम से, कच्चे और परिष्कृत ताड़ के तेल पर आयात शुल्क बढ़ाकर क्रमशः 30% और 40% कर दिया गया है, कच्चे और परिष्कृत सोयाबीन के तेल पर आयात शुल्क बढ़ाकर क्रमशः 30% और 35% कर दिया गया है, कच्चे और परिष्कृत सूरजमुखी के तेल पर आयात शुल्क बढ़ाकर क्रमशः 25% और 35% कर दिया गया है तथा कच्चे और परिष्कृत सफ़ेद सरसों के तेल पर आयात शुल्क बढ़ाकर क्रमशः 25% और 35% कर दिया गया है।

22. दिनांक 27, मार्च 2017 की अधिसूचना सं. 43/2015-20 के माध्‍यम से मूँगफली के तेल, तिल के तेल, सोयाबीन के तेल और मक्के के तेल को खाद्य तेलों के निर्यात से छूट दी गई है।

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