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चीनी

सामान्‍य

चीनी उद्योग एक महत्‍वपूर्ण कृषि आधारित उद्योग है जो लगभग 50 मिलियन गन्‍ना किसानों और चीनी मिलों में सीधे नियोजित 5 लाख कर्मियों की ग्रामीण आजीविका को प्रभावित करती है। परिवहन, मशीनरी की व्‍यापार सेवाओं और कृषि आदानों की आपूर्ति से संबंधित विभिन्‍न सहायक गतिविधियों में भी रोजगार के अवसर उत्‍पन्‍न हुए हैं। भारत ब्राजील के बाद विश्‍व में चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्‍पादक और सबसे बड़ा उपभोक्‍ता भी है। आज भारतीय चीनी उद्योगों का वार्षिक उत्‍पादन अनुमानत: 80000 करोड. रूपए है।

देश में 30.11.2012 की स्‍थिति के अनुसार 682 चीनी मिलें स्‍थापित हैं जिनकी पिराई क्षमता लगभग 300 लाख टन चीनी उत्‍पादन की है। यह क्षमता मोटे तौर पर निजी क्षेत्र की तथा सहकारिता क्षेत्र की यूनिटों में बराबर विभाजित है। कुल मिलाकर चीनी मिलों की क्षमता 2500 टीसीडी से 5000 टीसीडी के रेंज में है लेकिन इसमें तेजी से वृद्धि हो रही है तथा यह क्षमता 10000 टीसीडी को पार कर रही है।

दो आधुनिक रिफाइनरीज भी देश में गुजरात तथा पश्‍चिम बंगाल के तटवर्ती क्षेत्रों में स्‍थापित की गई हैं। ये रिफाइनरियां मुख्‍यतया आयातित कच्‍ची चीनी तथा घरेलू कच्‍ची चीनी से रिफाइंड चीनी का उत्‍पादन करती हैं।

देश में चीनी मिलों का क्षेत्रवार ब्‍यौरा इस प्रकार है:

क्र. सं. क्षेत्र फैक्‍ट्रियों की संख्‍या
1 निजी 298
2 सार्वजनिक 62
3 सहकारी 324

कुल 684*

*इनमें बन्‍द चीनी मिलें रिफाइनरी भी शामिल हैं।

गन्‍ना मूल्‍य निर्धारण नीति

22.10.2009 से गन्‍ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 में संशोधन के साथ 2009-10 और अगले चीनी मौसमों के लिए गन्‍ने के सांविधिक न्‍यूनतम मूल्‍य (एसएमपी) की संकल्‍पना को गन्‍ने के ‘’उचित एवं लाभकारी मूल्‍य’’ से बदल दिया गया था। केन्‍द्रीय सरकार द्वारा घोषित गन्‍ना मूल्‍य का निर्णय राज्‍य सरकारों और चीनी उद्योग के संस्‍थानों से विचार-विमर्श के उपरांत कृषि लागत और मूल्‍य (सीएसीपी) आयोग की सिफारिशों के आधार पर तय किया जाता है। गन्‍ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 के संशोधित प्रावधानों में गन्‍ने की एफ आर पी का निर्धारण करने के लिए निम्‍नलिखित कारकों को ध्‍यान में रखने हेतु व्‍यवस्‍था दी है:-

  • गन्‍ने के उत्‍पादन की लागत।
  • वैकल्‍पिक फसलों से उत्‍पादों की आमदनी और कृषि वस्‍तुओं के मूल्‍यों के सामान्‍य रूझान।
  • उचित मूल्‍य पर उपभोक्‍ताओं के लिए चीनी की उपलब्‍धता।
  • वह मूल्‍य जिस पर गन्‍ना उत्‍पादकों द्वारा गन्‍ने से उत्‍पादित चीनी की बिक्री की जाती है।
  • गन्‍ने से चीनी की प्राप्‍ति।
  • * सह-उत्‍पादों जैसे-शीरा, खोई और प्रेस मड की बिक्री से या उनके द्वारा तय की गई कीमत से हुई प्राप्‍ति।
    (*दिनांक 29.12.2008 की अधिसूचना द्वारा अंतःस्थापित)
  • ** जोखिम और लाभ के प्रति गन्ना किसानों के लिए उचित मार्जिन।
    (**दिनांक 22.10.2009 की अधिसूचना द्वारा अंतःस्थापित)

एफआरपी प्रक्रिया के अंतर्गत किसानों को मैसम के समाप्‍त होने या चीनी मिलों या सरकार द्वारा किसी भी प्रकार के लाभ की घोषणा करने की प्रतीक्षा करने की आवश्‍यकता नहीं है। नई प्रणाली सभी वर्षों में किसानों के लाभ या जोखिम के कारण मार्जिन को इस तथ्‍य की परवाह किए बगैर कि चीनी मिलों ने लाभ कमाया है या नहीं और वह किसी भी एक चीनी मिल के निष्‍पादन पर निर्भर नहीं करती, मार्जिन देने का भी आश्‍वासन दिया है।

यह सुनिश्‍चित करने के लिए कि सर्वाधिक चीनी वसूली को पर्याप्‍त रूप से पुरस्‍कृत किया जाए और चीनी मिलों के बीच विविधता गन्‍ने से चीनी की उच्‍च वसूलियों के लिए किसानों के प्रीमियम देयों के साथ एफआरपी को चीनी के मौलिक/मूलभूत वसूली दर से जोड़ दिया गया है।

तदनुसार, चीनी मौसम 2015-16 के लिए एफआरपी को 230 रू प्रति क्‍विंटल निर्धारित किया है, जिसे 9.5% की मूल प्राप्‍ति के साथ जोड़ा गया है और प्रत्‍येक 0.1% बिंदु की बढ़ोत्‍तरी के लिए 2.42 रू प्रति क्‍विंटल की वृद्धि की गई है। 2009-10 से 2015-16 तक प्रत्‍येक चीनी मौसम के लिए चीनी उद्योग द्वारा गन्‍ना देय की एफआरपी निम्‍न तालिका में दिया गया है:-

चीनी मौसम एफआरपी (रूपए प्रति क्‍विंटल) मौलिक वसूली दर
2009-10 129.84 9.5%
2010-11 139.12 9.5%
2011-12 145.00 9.5%
2012-13 170.00 9.5%
2013-14 210.00 9.5%
2014-15 220.00 9.5%
2015-16 230.00 9.5%

डा. सी. रंगराजन समि ति की रिपोर्ट की सिफारिशों पर चीनी क्षेत्र का नियंत्रणमुक्‍त होना

वर्ष 2013-14 चीनी उद्योग के लिए समृद्धि का वर्ष था। केन्‍द्रीय सरकार ने चीनी क्षेत्र को नियंत्रणमुक्‍त करने हेतु डा. सी. रंगराजन की अध्‍यक्षता वाली समिति की सिफारिशों पर विचार किया और सितम्‍बर, 2012 के उपरांत उत्‍पादित चीनी के लिए मिलों पर लेवी बाध्‍यता की प्रणाली को हटाने का निर्णय लिया और चीनी की खुले बाजार से बिक्री पर विनियमित निर्गम तंत्र को समाप्‍त कर दिया। चीनी मिलों के वित्‍तीय स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार लाने के लिए नकदी प्रवाह का बढ़ाने, माल की लागत को कम करने और गन्‍ना किसानों के गन्‍ना मूल्‍यों का समय पर भुगतान करने के लिए चीनी क्षेत्र को नियंत्रणमुक्‍त किया गया। गन्‍ना क्षेत्र आरक्षण, न्‍यूनतम दूरी मापदंड और गन्‍ना मूल्‍य फार्मूला को अपनाने से संबंधित समिति की सिफारिशें को अपनाने और उसके कार्यान्‍वयन के लिए जो भी उनके अनुसार उचित समझा जाए राज्‍य सरकारों पर छोड़ दिया गया है। समिति की सिफारिशों और सरकार द्वारा की गई कार्रवाई का सार निम्‍नानुसार है:-

डा. सी. रंगराजन की समिति की सिफारिशों का कार्यान्‍वयन

मुद्दे सिफारिशों का सार की गई कार्रवाई
गन्‍ना क्षेत्र का आरक्षण आने वाले समय में राज्‍य ऐसी बाजार आधारित दीर्घावधिक संविदात्‍मक व्‍यवस्‍थाओं के विकास को प्रेरित करे और गन्‍ना आरक्षण क्षेत्र तथा बोंडिंग को चरणबद्ध समाप्‍त करे। अंतरिम तौर पर वर्तमान व्‍यवस्‍था जारी रखी जाए। राज्‍यों से अनुरोध किया गया है कि वे कार्यान्‍वयन के लिए जैसा उचित समझें सिफारिशों पर विचार करें। अभी तक किसी भी राज्‍य ने कोई कदम नहीं उठाया है, वर्तमान प्रणाली जारी है।
न्‍यूनतम दूरी मानदंड यह गन्‍ना किसानों अथवा चीनी विकास क्षेत्र के हित में नहीं है और जब कभी राज्‍य गन्‍ना आरक्षण क्षेत्र और बोंडिंग को हटाएं तो इसे समाप्‍त कर दिया जाए। राज्‍यों से अनुरोध किया गया है कि वे कार्यान्‍वयन के लिए जैसा उचित समझें सिफारिशों पर विचार करें। महाराष्‍ट्र में कोई क्षेत्र आरक्षण नहीं है। बाकी राज्‍यों ने वर्तमान व्‍यवस्‍था में कोई बदलाव नहीं किया है।
गन्‍ना मूल्‍य: राजस्‍व भागीदारी सह-उत्‍पादों (शीरा और खोई/सह-विद्युत उत्‍पादन) के लिए उपलब्‍ध आकंड़ों के विश्‍लेषण के आधार पर राजस्‍व भागीदारी अनुपात का केवल मिल के बाहर चीनी मूल्‍य का मोटे तौर पर 75 प्रतिशत राशि का अनुमान लगाया गया है। राज्‍यों से अनुरोध किया गया है कि वे कार्यान्‍वयन के लिए जैसा उचित समझें सिफारिशों पर विचार करें। अब तक केवल कर्नाटक और महाराष्‍ट्र ने ही इन सिफारिशों के कार्यान्‍वयन के लिए राज्‍य नियमों को पारित किया है।
लेवी चीनी लेवी चीनी को हटा दिया जाए। वे राज्‍य जो पीडीएस के तहत चीनी उपलब्‍ध कराना चाहते हैं वे अपनी आवश्‍यकतानुसार सीधे ही बाजार से इसे खरीद सकते हैं और जारी मूल्‍य भी निर्धारित कर सकते हैं। तथापि, वर्तमान में लेवी के कारण क्रास सब्‍सिडी अंतरनिहित है, राज्‍यों को इस कारण होने वाली लागत में आने वाले खर्च को पूरा करने हेतु उनकी सहायता के लिए अल्‍पकालिक अवधि के लिए कुछ हद तक केंद्रीय सहायता उपलब्‍ध कराई जाए। केन्‍द्रीय सरकार ने 01 अक्‍तूबर, 2012 के पश्‍चात चीनी उत्‍पाद पर लेवी को समाप्‍त कर दिया है। राज्‍यों/संघ शासित क्षेत्रों द्वारा पीडीएस प्रचालन के लिए खरीद खुले बाजार से की जा रही है और सरकार 18.50 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से निर्धारित सब्‍सिडी उपलब्‍ध करा रही है।
विनियमित निर्मुक्‍ति तंत्र इस तंत्र से किसी लाभदायक उद्देश्‍य की पूर्ति नहीं हो रही है और इसे समाप्‍त कर दिया जाए। निर्मुक्‍ति तंत्र को समाप्‍त कर दिया गया है।
व्‍यापार नीति समिति के अनुसार चीनी संबंधी व्‍यापार नीतियां स्‍थाई होनी चाहिएं। यथोचित सीमा-शुल्‍क तंत्र जैसे सामान्‍य निर्यात कर सामान्‍यतया 5 प्रतिशत से अधिक न हो, प्रमात्रात्‍मक प्रतिबंधों के विपरीत इसका आर्थिक रूप से दक्ष रीति से चीनी की घरेलू आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोग किया जाना चाहिए। चीनी पर कोई निर्यात शुल्‍क नहीं है। आयात शुल्‍क को दिनांक 20.8.2014 से 15 प्रतिशत से बढ़ा कर 25 प्रतिशत कर दिया गया है।
सह-उत्‍पादक शीरे और इथनाल जैसे सह-उत्‍पादों पर कोई प्रमात्रात्‍मक अथवा आवाजाही प्रतिबंध नहीं होने चाहिए। सह-उत्‍पादों के मूल्‍य चिन्‍हित एंड यूस्‍ड आवंटनों के साथ बाजार निर्धारित होने चाहिए। ऐसी कोई विनियामक बाधा नहीं होनी चाहिए जो चीनी मिलों को किसी उपभोक्‍ता को अपने सरप्‍लस पावर को बेचने में रोक लगाए। पेय अल्‍कोहल/शराब पर उत्‍पाद शुल्‍क राज्‍य सरकारों के लिए राजस्‍व का मुख्‍य स्रोत है इसलिए यह स्थिति एक राज्‍य से दूसरे राज्‍य में भिन्‍न है। राज्‍य सरकारों से पहले से ही यह अनुरोध किया जा चुका है कि शीरे की आवाजाही की विनियामक नियंत्रणों पर पुनर्विचार करें जिसका इथनाल उत्‍पादन के लिए उपयोग किया जा सकता है।
अनिवार्य जूट पैकिंग हटा दिया जाए। जूट बैगों में चीनी की अनिवार्य पैकिंग में और भी ढ़ील दी गई है और उत्‍पादन के केवल 20 प्रतिशत को जूट के बैगों में अनिवार्य रूप से पैक किया जाना है।

पीडीएस के माध्‍यम से चीनी के वितरण के लिए मौजूदा प्रणाली की समीक्षा

केन्‍द्रीय सरकार ने अप्रैल, 2013 में चीनी क्षेत्र को नियंत्रणमुक्‍त करने के बाद लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के माध्‍यम से चीनी के वितरण के लिए नई वितरण प्रणाली शुरू की। नई प्रणाली के तहत राज्‍य सरकारों/संघ राज्‍य क्षेत्र प्रशासनों को खुले बाजार से चीनी की खरीद करने की आवश्‍यकता है और टीपीडीएस में उसे उपलब्‍ध कराना है। केन्‍द्रीय सरकार को मौजूदा आबंटनों पर आधारित सीमित मात्रा को 18.50 रूपए प्रति किग्रा. की दर से निर्धारित सब्‍सिडी की प्रतिपूर्ति करनी है। राज्‍य सरकारों/संघ राज्‍य क्षेत्र प्रशासनों को या तो अतिरिक्‍त लागत से रखरखाव परिवहन और डीलरों की कमीशन पर हुए खर्च को शामिल करना पीडीएस के अंतर्गत 13.50 रूपए प्रति किग्रा. खुदरा निर्गम मूल्‍य को शामिल करते हुए उपभोक्‍ताओं को बेचना। इसके साथ, राज्‍य सरकारों/संघ राज्‍य क्षेत्र प्रशासनों एनएफएसए का कार्यान्‍वयन पर मौजूदा दायरे को जारी रखने या चीनी के मौजूदा आबंटन में एनएफएसए के तहत लाभार्थियों को बढ़ाने की अनुमति दी गई है।

एथनाल सम्‍मिश्रित पैट्रोल कार्यक्रम (ईबीपी कार्यक्रम)

एथनाल कृषि आधारित उत्‍पाद है, खासकर चीनी उद्योग के सह-उत्‍पाद अर्थात शीरे से उत्‍पादित है। अधिक गन्‍ना उत्‍पादन होने वाले वर्षों में जब मूल्‍यों में मंदी छाई रही है, चीनी उद्योग किसानों के गन्‍ना मूल्‍य का समय पर भुगतान करने में असमर्थ होते हें। मोटर स्‍प्रिट के साथ एथनाल सम्‍मिश्रण कार्यक्रम (ईबीपी) का उद्देश्‍य चीनी उद्योग में प्रदूषण कम करने, विदेशी मुद्रा का संरक्षण करने तथा मूल्‍य वृद्धि संवर्द्धन के साथ एथनाल सम्‍मिश्रण के लक्ष्‍य को हासिल करना है।

केन्‍द्रीय सरकार ने एथनाल सम्‍मिश्रण कार्यक्रम (ईबीपी) के अंतर्गत सम्‍मिश्रण लक्ष्‍य को 5% से बढ़ाकर 10% तक कर दिया है। ईबीपी के तहत एथनाल के खरीद की प्रक्रिया को संपूर्ण एथनाल आपूर्ति की श्रृंखला को कारगर बनाने के लिए आसान बना दी है तथा लाभकारी एथनाल की एक्‍स-डिपो कीमत निर्धारित की है।

सम्‍मिश्रण के नए लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने को सरल बनाने के लिए ‘’ग्रिड’’ जिसके नेटवर्क में ओ एम सी डिपुओ की डिस्‍टिलरियां शामिल हैं तथा आपूर्ति की जाने वाली मात्राओं की गणना कर दी गई है। दूरी, क्षमता और अन्‍य क्षेत्रीय मांगों को ध्‍यान में रखते हुए राज्‍यवार मांग प्रोफाइल का अनुमान लगाया गया है। 2015-16 के दौरान चीनी मिलों द्वारा ईबीपी के लिए ओएमसी को एथनाल की आपूर्ति पर उत्‍पाद शुल्‍क को भी समाप्‍त कर दिया गया है।

चीनी उपक्रमों को वित्‍तीय सहायता प्रदान करने हेतु स्‍कीम (सेफासु-2014)

सरकार ने 3.1.2014 को गन्‍ना किसानों को पिछले चीनी मौसमों के गन्‍ना मूल्‍य बकायों के भुगतान के लिए और चीनी मौसम 2013-14 के गन्‍ना मूल्‍य के समय पर निपटान के लिए चीनी मिलों का अतिरिक्‍त कार्यशील पूंजी के रूप में बैंकों द्वारा चीनी उपक्रमों को वित्‍तीय सहायता प्रदान करने हेतु ब्‍याजमुक्‍त ऋण के साथ एक स्‍कीम (सेफासु-2014) अधिसूचित की है। इस स्‍कीम के तहत 6420 करोड़ रूपए वितरित किए गए। इस ऋण पर ब्‍याज के बोझ को चीनी विकास निधि के माध्‍यम से सरकार द्वारा अगले पांच वर्षों के लिए वहन किया जाएगा।

कच्‍ची चीनी के उत्‍पादन पर विपणन और संवर्द्धन सेवाओं के लिए प्रोत्‍साहन

सरकार ने 28.2.2014 को चीनी मौसम 2013-14 के दौरान निर्यात के लिए लक्षित कच्‍ची चीनी उत्‍पादन के संवर्द्धन और विपणन सेवाओं के लिए प्रोत्‍साहन जारी रखने की एक स्‍कीम अधिसूचित की है जिसे चीनी मौसम 2014-15 तक आगे बढ़ा दिया गया। प्रोत्‍साहन राशि को गन्‍ना उत्‍पादकों के गन्‍ना मूल्‍य देयों के भुगतान के लिए प्रयोग में लिया जाएगा।

गन्‍ना मूल्‍य बकायों के भुगतान को सुविधाजनक बनाने के लिए चीनी मिलों को सॉफ्ट ऋण

चीनी मौसम 2014-15 को गन्‍ना मूल्‍य बकायों को सुविधाजनक बनाने के लिए चीनी मिलों को सॉफ्ट ऋण प्रदान कराने के लिए 23.6.2015 को एक स्‍कीम अधिसूचित की गई। इस स्‍कीम के तहत 4305 करोड़ रूपए वितरित किए गए। सरकार द्वारा एक वर्ष की बिलंबन अवधि के साथ ब्‍याज माफी का बोझ उठाया गया।

न्‍यूनतम निर्देशात्‍मक निर्यात कोटा (एमआईईक्‍यू)

घरेलू चीनी मूल्‍य के रूझान में सुधार लाने को दृष्‍टिगत रखते हुए सरकार ने प्रत्‍येक मिल को उसके चीनी उत्‍पादन के अनुपात में निर्देशात्‍मक निर्यात लक्ष्‍यों को निर्धारित किया ताकि 4 मि. मी. टन का चीनी स्‍टाक खाली किया जा सके। कोई निर्यात सब्‍सिडी या प्रोत्‍साहन प्रस्‍तावित नहीं कराया गया और उद्योग से प्रचालित अंतर्राष्‍ट्रीय मूल्‍यों पर निर्यात करने और जो क्षति हुई उसे पूरा करने की उम्‍मीद की जा रही हैा यह भी उम्‍मीद की जा रही है कि स्‍टाक की निकासी से घरेलू चीनी मूल्‍यों में बढ़ोत्‍तरी होगी और गन्‍ना मूल्‍यों के अधिक समर्थित स्‍तर तक पहुंच जाएगा। यह न्‍यूनतम निर्देशात्‍मक निर्यात कोटा (एमआईईक्‍यू) है। उद्योग अधिक मात्रा में निर्यात कर सकती है और उसे वैश्‍विक बाजार की मांग पर आधारित कच्‍ची, श्‍वेत या परिष्‍कृत चीनी निर्यात करने के लिए स्‍वतंत्र है। कोटा को भी व्‍यापार योग्‍य बनाया गया है।

उत्‍पादन सब्‍सिडी

सरकार ने दिनांक 2.12.2015 की आधिसूचना के तहत वर्तमान चीनी मौसम 2015-16 के लिए चीनी मिलों को गन्‍ना की लागत की भरपाई करने के लिए और वर्तमान चीनी मौसम 2015-16 के लिए किसानों के गन्‍ना मूल्‍य देयों के समय पर भुगतान करने के लिए 4.50 रूपए प्रति क्‍विंटल की दर से उत्‍पादन सब्‍सिडी प्रदान की है। उत्‍पादन सब्‍सिडी का भुगतान तभी किया जाएगा जब मिलें निर्यात और एथनाल सम्‍मिश्रण के लक्ष्‍यों को प्राप्‍त कर लेंगी।

गन्‍ना मूल्‍य बकाया

यद्यपि चीनी मिलों द्वारा किसानों को गन्‍ने के मूल्‍य का भुगतान विभिन्‍न संविधियों द्वारा सांविधिक रूप से समर्थित होता है और राज्‍य सरकारों द्वारा प्रवृत्‍त किया जाता है, तथापि यह घरेलू बाजार में मूल्‍यों में परिवर्तन तथा साथ ही निर्यात संभावनाओं से संबंधित अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्थिति से प्रभावित हो जाता है। इसके बावजूद, पिछले दो चीनी मौसमों के लिए देश में चीनी का उत्‍पादन घरेलू आवश्‍यकताओं से अधिक था और 2012-13 के दौरान घरेलू आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त होने की आशा है, समय पर हस्‍तक्षेप करने के कारण इन मौसमों के दौरान गन्‍ने के मूल्‍य की बकाया धनराशि न्‍यूनतम रखी जा सकी है।

31.12.2012 को स्थिति के अनुसार, चीनी मौसम 2012-13 के लिए गन्‍ना मूल्‍य के भुगतान और बकाया की स्थिति निम्‍नानुसार है :

(करोड़ रुपये में)

विवरण मूल्‍य
देय गन्‍ना मूल्‍य 17371.09
अदा किया गया गन्‍ना मूल्‍य 9531.26
गन्‍ना मूल्‍य बकाया 7839.83
देय गन्‍ना मूल्‍य की तुलना में गन्‍ना मूल्‍य बकाया की प्रतिशतता 45.13

चीनी नीति

आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1955 के अधीन चीनी एक आवश्‍यक वस्तु है। केन्‍द्रीय सरकार चीनी के लिए आंशिक नियंत्रण और दोहरे मूल्‍य की नीति का अनुसरण कर रही है। इस नीति के अधीन, चीनी फैक्ट्रियों द्वारा उत्‍पादित चीनी की एक कतिपय प्रतिशतता (2009-10 चीनी मौसम के लिए बढ़ाकर 20% और 2010-11 चीनी मौसम तथा 2011-12 चीनी मौसम के लिए कम करके 10 प्रतिशत) सरकार द्वारा प्रत्‍येक मौसम के लिए उसके द्वारा निर्धारित मूल्‍य पर अनिवार्य लेवी के रूप में अधिग्रहीत कर ली जाती है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन लेवी चीनी पूरे देश में एक-समान खुदरा निर्गम मूल्‍य पर संवितरित की जाती है। विनियमित रिलीज व्‍यवस्‍था के अधीन केन्‍द्रीय सरकार द्वारा रिलीज की गई मात्रा के अनुसार गैर-लेवी (खुली बिक्री) चीनी को बेचने की अनुमति दी जाती है। वर्ष 2012-13 के दौरान, चीनी मिलों को उनके माल के प्रबंधन में अधिक लचीलापन प्रदान करने के लिए रिलीजें त्रैमासिक आधार पर घोषित की गईं थीं।

लेवी चीनी देयता

आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1955 की धारा 3(3ग) के अधीन, लेवी चीनी का मूल्‍य (चीनी मौसम 2008-09 तक) केन्‍द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित किया जाना अपेक्षित है। तथापि, चीनी मौसम 2009-10 से लेवी चीनी का मूल्‍य निर्धारित करने के लिए दिनांक 22.12.2009 की अधिसूचना द्वारा आवश्‍यक वस्तु अधिनियम की धारा 3(3ग) में संशोधन किया गया है। निम्‍नलिखित तथ्‍यों को ध्‍यान में रखते हुए मूल्‍य निर्धारित किए जाते हैं :

  • इस धारा के अधीन केन्‍द्रीय सरकार द्वारा चीनी मौसम 2008-09 तक गन्‍ने का निर्धारित न्‍यूनतम मूल्‍य, यदि कोई हो, और चीनी मौसम 2009-10 से उचित और लाभकारी मूल्‍य,
  • चीनी की विनिर्माण लागत
  • उस पर अदा किया गया देय शुल्‍क अथवा कर, यदि कोई हो; और
  • चीनी के विनिर्माण के व्‍यवसाय में लगाई गई पूंजी पर उचित लाभ।

चीनी सब्सिडी

राज्य सरकारों द्वारा चीनी के उठान, ढुलाई और वितरण पर किए गए व्यय और थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता के मार्जिन को जोड़कर तथा खुदरा निर्गम मूल्य पर लेवी चीनी की बिक्री से प्राप्त धनराशि घटाकर परिकलित धनराशि केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों को भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से चीनी सब्सिडी के रूप में अदा की जाती है। वास्तव में, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के प्रचालनों के कारण पूरी चीनी सब्सिडी भारत सरकार द्वारा दी जाती है। चीनी के वर्तमान लेवी मूल्यों पर इस कारण से सब्सिडी की वार्षिक आवश्यकता लगभग 3000 करोड़ रूपये है। देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन लेवी चीनी का खुदरा निर्गम मूल्य 01.03.2002 से 13.50 रूपये प्रति किलोग्राम है।

इथनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम (ईबीपी कार्यक्रम)

इथनॉल कृषि आधारित उत्‍पाद है जो चीनी उद्योग के सह-उत्‍पाद शीरा से निकाला गया मौलिक उत्‍पाद है। गन्‍ना के अधिशेष उत्‍पादन वाले वर्षों में, जब चीनी की कीमतें काफी कम हो जाती हैं तो चीनी उद्योग किसानों के गन्‍ने की कीमत का भुगतान करने में असमर्थ हो जाता है। यह मुख्‍यतया चीनी का अत्‍यधिक उत्‍पादन होने से होता है। इथनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम न केवल प्रदूषण को कम करता है वरन यह इथनॉल के उपयोग के लिए एक अन्‍य आऊटलेट भी प्रदान करता है। इस प्रकार चीनी के उत्‍पादन के दौरान शीरे के सह-उत्‍पाद के रूप में इसका उपयोग सुनिश्‍चित होता है।

इथनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम वर्ष 2007 से आरम्‍भ किया गया है। मंत्रिमंडल की आर्थिक कार्य समिति ने 22 नवम्बर, 2012 को हुई अपनी बैठक में इथनॉल के मूल्‍य निर्धारण पर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्टों पर मंत्रियों के समूह और प्रधान मंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सिफारिशों पर विचार किया और यह अनुमोदित किया कि सरकार द्वारा इथनॉल का खरीद मूल्य निर्धारित नहीं किया जाएगा और अब यह विपणन कम्पनियों तथा आपूर्तिकर्ताओं के बीच तय किया जाएगा। मंत्रिमंडल के उपर्युक्त निर्णय के अनुसरण में, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पूरे देश में पेट्रोल में 5 प्रतिशत अनिवार्य मिश्रण को क्रियान्वित करने के लिए दिनांक 02.01.2013 को एक गजट अधिसूचना जारी की है।

चीनी क्षेत्र के संबंध में डॉ. सी. रंगराजन समिति की रिपोर्ट

चीनी उद्योग के संबंध में डॉ. सी. रंगराजन की अध्यक्षता में समिति ने अपनी रिपोर्ट 05 अक्तूबर, 2012 को सरकार को प्रस्तुत कर दी है। समिति ने, अन्य बातों के साथ-साथ, लेवी चीनी की देयता समाप्त करने, गैर-लेवी चीनी पर विनियमित रिलीज व्यवस्‍था समाप्त करने, गन्ने के मूल्य-निर्धारण को युक्तियुक्त करने, गन्ना क्षेत्र आरक्षण प्रणाली और बांडिंग समाप्त करने, न्यूनतम दूरी का मानदंड समाप्त करने क्योंकि राज्य गन्ना क्षेत्र आरक्षण जारी रखते हैं, चीनी व्यापार का उदारीकरण करने, वास्तविक उपयोग के आवंटन निर्धारित किए बिना सह-उत्पादों के बाजार मूल्यों का निर्धारण करने और चीनी को जूट पैकेजिंग सामग्री (पैकेजिंग वस्तु में अनिवार्य उपयोग) अधिनियम, 1987 के दायरे से बाहर रखने की सिफारिशें की हैं। समिति की सिफारिशें सरकार के विचाराधीन हैं।

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