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पीपीपी पद्धति से गोदामों का निर्माण

खाद्यान्नों के उत्पादन/खरीद के बढ़ते स्तर की जरूरतों को पूरा करने और खाद्यान्नों के खुले स्थान पर भंडारण अर्थात कवर एंड प्लिंथ (सीएपी) पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से यह विभाग सार्वजनिक-निजी-भागीदारी (पीपीपी) पद्धति से भारतीय खाद्य निगम की भंडारण क्षमता में वृद्धि करने के लिए निजी उद्यमी गारंटी स्कीम नामक एक स्कीम कार्यान्वित कर रहा है। यह स्कीम वर्ष 2008 में गैर-डीसीपी राज्यों के लिए शुरू की गई थी, और फिर इसे डीसीपी राज्यों पर भी लागू किया गया था। गोदामों का निर्माण सरकार के किसी निवेश के बिना निजी निवेशकों अथवा केन्द्रीय भंडारण निगम/राज्य भंडारण निगमों द्वारा किया जाता है। पार्टियों को अपने निवेश से आय किराए के माध्यम से प्राप्त होती है, क्योंकि भारतीय खाद्य निगम गोदामों को निजी पार्टियों के मामले में 10 वर्ष की गारंटी अवधि के लिए किराए पर लेता है। सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसियों के लिए यह अवधि 9 वर्ष है।

निजी पार्टियों के मामले में नामित नोडल एजेंसी द्वारा 2 बोली प्रणाली के अंतर्गत राज्यवार निविदाएँ आमंत्रित की जाती हैं। तकनीकी बोली स्‍तर पर साईटों का निरीक्षण किया जाता है तथा जो साइटें उपयुक्‍त पाई जाती हैं उन्‍हीं से संबंधित बोलियों पर आगे कार्रवाई की जाती है। सबसे कम बोली लगाने वाले बोलीकर्ताओं को निविदाएं आबंटित की जाती हैं। गैर-रेलवे साइडिंग गोदामों का निर्माण एक वर्ष में किया जाना अपेक्षित है, जबकि रेलवे साइडिंग वाले गोदामों के निर्माण के लिए दो वर्ष की निर्माण अवधि की अनुमति दी गई है। इस अवधि को निवेशक के अनुरोध पर एक वर्ष और बढ़ाया जा सकता है। गोदाम का निर्माण कार्य पूरा होने के पश्‍चात भारतीय खाद्य निगम तथा शीर्ष एजेंसी की संयुक्‍त समिति द्वारा अंतिम निरीक्षण किया जाता है तथा पूर्ण रुप से तथा विनिर्दिष्‍टयों के अनुसार तैयार गोदामों का अधिग्रहण गारंटी आधार पर किया जाता है।

गोदामों के निर्माण के लिए स्‍थानों की पहचान भारतीय खाद्य निगम द्वारा राज्‍य स्‍तरीय समितियों की सिफारिशों के आधार पर की गई थी। उपभोक्‍ता क्षेत्रों के लिए भंडारण अंतर का आकलन सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) तथा अन्‍य कल्‍याणकारी योजनाओं (ओडब्‍ल्‍यूएस) की चार माह की आवश्‍यकताओं के आधार पर किया जाता है, जबकि खरीद वाले राज्‍यों के संबंध में भंडारण अंतर का आकलन खरीद क्षमता को ध्‍यान में रखते हुए विगत तीन वर्षों में उच्‍चतम स्‍टॉक स्‍तर के आधार पर किया गया है।

यह स्कीम21 राज्यों में प्रचालित की जा रही है। दिनांक 30.11.2017 की स्‍थिति के अनुसार निर्माण के लिए 150.99 लाख टन क्षमता स्‍वीकृत की गई है तथा 139.92 लाख टन क्षमता का निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया है। इसके अलावा,7.67 लाख टन की क्षमता का निर्माण विभिन्न चरणों में है।

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